Science Light

प्रकाश (light)



वह भौतिक साधन जो वस्तुओं को देखने में काम आता है।
प्रकाश विधुत चुम्बकीय तरंगों का ही भाग है। जिसे हम देख सकते है। प्रकाश की सम्पुर्ण गुणों की व्याख्या के लिए प्रकाश के फोटाॅन सिद्धान्त का सहारा लेना पड़ता है।

परावर्तन (Reflection)

प्रकाश किरण का किसी सतह से टकराकर पुनः उसी माध्यम में लौट आना परावर्तन कहलाता है।



नियम
1. आपतीत किरण, अभिलम्ब एवं परावर्तीत किरण तीनों एक ही तल में होने चाहिए।
 2. परावर्तन कोण एवं आपतन कोण का मान बराबर होना चाहिए।

आपतित किरण - सतह पर पड़ने वाली किरण
परावर्तित किरण - टकराने के पश्चात लौटने वाली किरण
आपतन कोण - अभिलम्ब व आपतित किरण के बिच का कोण
परावर्तन कोण - अभिलम्ब व परावर्तित किरण के बिच का कोण।
उदाहरण
दर्पण में प्रतिबिम्ब का दिखाई देना।
ग्रहों का चमकना।
वस्तुओं के रंग का निर्धारण।

प्रकाश का पुर्ण आंतरिक परावर्तन Total Internal Reflection of light (हमेशा सघन से विरल)

जब प्रकाश किरण सघन माध्यम से विरल माध्यम में प्रवेश करती है। तो एक विशिष्ट आपतन कोण पर किरण समकोण पर अपवर्तित होती है। इस कोण को क्रान्तिक कोण कहते है। यदि आपतन कोण क्रान्तिक कोण से अधिक हो जाये तो प्रकाश किरण वापस उसी माध्यम में लौट आती है। इसे पुर्ण आन्तरिक परावर्तन कहते है।

उदाहरण

हिरे का चमकना।
मृग मरीचिका।
पानी में डुबी परखनली का चमकीला दिखाई देना।
कांच का चटका हुआ भाग चमकीला दिखाई देना।





अपवर्तन (Refraction)

एक माध्यम से दुसरे माध्यम में प्रवेश करते समय प्रकाश किरण का मार्ग से विचलित हो जाना प्रकाश का अपवर्तन कहलाता है।

जब प्रकाश किरण विरल माध्यम से सघन माध्यम की ओर जाती है। तो अभिलम्ब की ओर झुक जाती है। जब प्रकाश किरण सघन माध्यम से विरल माध्यम में आती है तो अभिलम्ब से दुर हट जाती है।


स्नेल का नियम
μ = sin i/sin r = sin θ
μ = निर्वात में प्रकाश का वेग/माध्यम में प्रकाश का वेग
उदा. 
पानी में सिक्का ऊपर उठा हुआ दिखाई देता है।     
तारों का टिमटिमाना
पानी में रखी झड़ का मुड़ा हुआ दिखाई देना। 
सूर्य उदय से पहले सूर्य का दिखाई देना।

परकाश का वर्ण विक्षेपण (Dispersion of light)

जब श्वेत प्रकाश को प्रिज्म में से गुजारा जाता है तो वह सात रंगों में विभक्त हो जाता है। इस घटना को वर्ण विक्षेपण कहते है तथा प्राप्त रंगों के समुह को वर्ण क्रम कहते है। अधिक तरंग दैध्र्य वाले प्रकाश अर्थात लाल रंग का विचलन कम तथा कम तरंगदैध्र्य वाले प्रकाश अर्थात बैंगनी का विचलन अधिक होता है।


ये सात रंग है - बैंगनी(Voilet) ,जामुनी(Indigo), आसमानी(Blue), हरा(Green), पीला(Yellow), नारंगी(Orange), तथा लाल(Red) निचे से ऊपर तक क्योंकि बैंगनी रंग में विक्षेपण सबसे अधिक व लाल रंग में सबसे कम होता है।
इसे आप ट्रिक
VIBGYOR से याद रख सकते हैं जो कि ऊपर से निचे है।
  • R - Red
  • O - Orange
  • Y - Yellow
  • G - Green
  • B - Blue
  • I - Indigo
  • V - Voilet
आपतित किरण को आगे बढ़ाने पर तथा निर्गत किरण को पीछे बढ़ाने पर उनके मध्य जो कोण बनता है उसे प्रिज्म कोण कहते है।

इन्द्रधनुष



यह परावर्तन, अपवर्तन, पूर्ण आन्तरिक परावर्तन और वर्ण विक्षेपण की घटना होती है।
प्रथम - लाल - हरा - बैंगनी
द्वितिय - बैंगनी - हरा - लाल

रंग 

वस्तुओं का अपना कोई रंग नहीं होता। प्रकाश का कुछ भाग वस्तुएं अवशोषित कर लेती हैं। जबकि कुछ भाग परावर्तित करती है। परावर्तित भाग ही वस्तु का रंग निर्धारित करता है। सफेद प्रकाश में कोई वस्तु लाल इसलिए दिखाई देती है क्योंकि वह प्रकाश के लाल भाग को परावर्तित करती है। जबकि अन्य सभी को अवशोषित करती है। अपादर्शी वस्तुओं का रंग परावर्तित प्रकाश के रंग पर निर्भर करता है। जबकि पारदर्शी वस्तु का रंग उनसे पार होने वाले प्रकाश के रंग पर निर्भर करता है।
जो वस्तु सभी प्रकाशीय रंगों को परावर्तित करती है सफेद दिखती है तथा जो सभी रंगों को अवशोषित कर लेती है काली दिखती है।
प्राथमिक रंग
लाल, हरा, नीला रंग प्रथम रंग कहलाते है। बाकि सभी रंग इनसे ही बने है।
गौण रंग - दो प्राथमिक रंगों के संयोग से बना रंग
लाल + हरा - पीला
जिन दो रंगों के मेल से श्वेत रंग प्राप्त होता है वह पुरक रंग कहलाते हैं।

लैंस (Lens)

लैंस एक अपवर्तक माध्यम है जो दो वक्र अथवा एक वक्र एवं एक समतल सतह से घिरा हो।
लेंस मुख्यतः दो प्रकार के होते है।
1. उत्तल लेंस (Convex lens) 2. अवतल लेंस (Concave lens)



उत्तल लेंस (Convex lens)
ये पतले किनारे एवं मध्य भाग में मोटे होते हैं। उत्तल लैंस गुजरने वाले प्रकाश को सिकोड़ता है अतः इसे अभिसारी लेंस कहते है।
उत्तल लेंस के प्रकार
1. उभयोत्तल 2. अवत्तलोत्तल 3. समतलोत्तल

अवतल लेंस (Concave lens)

ये बीच में पतले एवं किनारों पर मोटे होते हैं। ये प्रकाश को फैलाते है। अतः इन्हें अपसारी लैंस भी कहते है।
1. उभयावतल 2. उत्तलावतल 3. समतलावतल


लैंस शक्ति का मात्रक - डाॅयप्टर
सिद्धान्त - अपवर्तन
वक्रता केन्द्र - लेंसों का केन्द्र वक्रता केन्द्र कहलाता है। तथा इनकी त्रिज्या वक्रता त्रिज्या।
मुख्य अक्ष - लेंस के केन्द्र से गुजरने वाली काल्पनिक सिधी रेखा।
मुख्य फोक्स(F) - लैंस के दो मुख्य फोकस होते है।
प्रथम - मुख्य अक्ष पर स्थित वह बिन्दु जिस पर रखी वस्तु का प्रतिबिम्ब अन्नत पर प्राप्त होता है।
द्वितिय - अन्नत पर रखी वस्तु का प्रतिबिम्ब मुख्य अक्ष पर जिस बिन्दु पर प्राप्त होता है।
प्रकाशिक केन्द्र - लेंस का केन्द्रिय बिन्दु इसका प्रकाशिक केन्द्र कहलाता है।
फोकस दुरी(f) - प्रकाशिक केन्द्र से मुख्य फोकस की दुरी फोकस दुरी कहलाती है।
उत्तल लैंस की फोकस दुरी - धनात्मक
अवतल लैंस की फोकस दुरी - ऋणात्मक
लैंस की क्षमता(P) - किसी लैंस द्वारा प्रकाश किरणों को फैलाने या सिकोड़ने की दक्षता लैंस क्षमता कहलाती है।
P = 1/f
प्रतिबिम्ब दो प्रकार के होते है-
1. वास्तविक प्रतिबिम्ब 2. आभासी प्रतिबिम्ब

उत्तल लेंस से प्रतिबिम्ब
वस्तु                                      प्रतिबिम्ब
अन्नत पर                           F पर(छोटा)
2Fसे परे                              F और 2F के बीच(छोटा)
2f पर                                 2F पर(बराबर)
F और 2F के बीच-              2F से परे(बड़ा)
F पर                                 अन्नत पर( बहुत बड़ा)
प्रकाश केन्द्र व F के बीच     वस्तु की ओर(बड़ा आभासी)

अवतल लैंस से प्रतिबिम्ब
वस्तु                                                                   प्रतिबिम्ब
अन्नत पर                                                          F पर (आभासी सिधा)
वस्तु अन्नत को छोड़ कर कहीं भी                      प्रकाश केन्द्र व फोकस दुरी के मध्य
उपयोग
चश्मा में दुष्टि से सम्बधित रोगों में।
सुक्ष्मदर्शी में।
सिनेमा में चलचित्रों को बड़ा करके दिखाने में।

दृष्टि दोष एवं निराकरण

मनुष्य की दृष्टि परास 25 सेमी. से अन्नत तक

1. निकट दृष्टि दोष

दुर की वस्तुएं साफ दिखाई नहीं देती क्योंकि रेटिना पर प्रतिबिम्ब पहले(निकट) बन जाता है। इसके लिए अवतल लैंस का प्रयोग कर किरणों को अपसारित करके प्रतिबिम्ब रेटिना पर बनाया जाता है।

2. दुर दृष्टि दोष

निकट की वस्तुएं साफ दिखाई नहीं देती इसलिए उत्तल लेंस का प्रयोग किया जाता है।

3. जरा दृष्टि दोष

दोनों लेंस काम में आते है।
4. अबिन्दुता या दृष्टि वैषम्य
दो लम्बवत्त दिशाओं में विभेद नहीं हो सकता बेलनाकार लेंस उपयोग में लिये जाते है।

समतल दर्पण

समतल परावर्तक सतह वाला दर्पण समतल दर्पण कहलाता है यह शीशे पर चांदी या पारे की परत पाॅलिश कर बनाया जाता है।
समतल दर्पण में बना प्रतिबिम्ब समान दुरी, बराबर एवं आभासी होता है। समतल दर्पण में व्यक्ति को अपना पुरा प्रतिबिम्ब देखने के लिए दर्पण की ऊंचाई कम से कम व्यक्ति की ऊंचाई की आधी होनी चाहिए। यदि कोई व्यक्ति दर्पण की ओर चलता है। तो प्रतिबिम्ब दुगनी चाल से पास या दुर जाता हुआ प्रतित होता है।
यदि दो समतल दर्पण θ कोण पर परस्पर रखे है तो उनके मध्य रखी वस्तु के बने प्रतिबिम्बों की संख्या (360/θ)-1 होगी। अतः समकोण पर रखे दर्पणों के मध्य स्थित वस्तु के तीन प्रतिबिम्ब होंगे जबकि समान्तर स्थित दर्पणों के मध्य वस्तु के प्रतिबिम्ब अन्नत होंगे।

गोलीय दर्पण

दो प्रकार के अवतल व उत्तल
अवतल दर्पण
अभिसारी दर्पण भी कहते है।

अवतल दर्पण से बना प्रतिबिम्ब बड़ा एवं सीधा बनता है। अतः इसका प्रयोग दाढ़ी बनाने, डाॅक्टर द्वारा आंख, कान, नाक आदि के आन्तरिक भाग देखने में, गााड़ी की हेडलाइट, टार्च, सोलर कुकर में होता है।
उत्तल दर्पण
इसे अपसारी दर्पण भी कहते है।
उत्तल दर्पण से बना प्रतिबिम्ब छोटा होता है। इसका प्रयोग वाहनों में पिछे की वस्तुएं देखने के लिए किया जाता है। यह दर्पण विस्तार क्षेत्र अधिक होने से प्रकाश का अपसार करता है। अतः परावर्तक लैम्पों में किया जाता है।

तथ्य

सर्वप्रथम रोमर नामक वैज्ञानिक प्रकाश का वेग ज्ञात किया।

प्रकाश का वेग निर्वात में सर्वाधिक3*108 (3 गुणा 10 की घात 8) मीटर/सैकण्ड होता है।

प्रकाश को सुर्य से धरती तक आने में लगभग 8 मिनट 19 सैकण्ड का समय लगता है।

चन्द्रमा से पृथ्वी तक आने में 1.28 सेकण्ड का समय लगता है।

हीरा पुर्ण आंतरिक परार्वतन के कारण चमकता है।

प्रकाश वर्ष दुरी का मात्रक है।

दृश्य प्रकाश की तरंग देध्र्य 4000-8000 Ao होता है।

सूर्य का श्वेत प्रकाश सात रंगों का मिश्रण है।


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